अंबर किले की सुबह, जब रास्ता खाली होता है
सुबह अंबर की चढ़ाई पर भीड़ से पहले निकलना एक अलग ही जयपुर है। पतली गली में पाँव की आहट, माओटा झील के किनारे खामोश नाव, और नीचे से उठती चाय की खुशबू—सब मिलकर किले को जागते हुए भी आधा-सोया सा बना देते हैं। गाइड अभी अपनी बात समेट कर खड़े होते हैं, और टपरी वाला पहला गिलास उठा लेता है। तब किले की दीवार सिर्फ दीवार नहीं लगती; वह दिन की पहली रोशनी को पकड़ती है। म्हारे यहाँ सुबह का सुकून भी मेहमान जैसा होता है—थोड़ा देर का, पर याद रहने वाला। फिर जब पैरों की आहट बढ़ती है, अंबर अपना असली रंग दिखाता है: शांत, बड़ा, और बिना शोर के गहरा।
