बांधनी: रेत जैसे बिखरे रंग
बांधनी का मजा पहले नज़र में नहीं, काम के बीच में दिखता है। रेशम या मलमल के कपड़े पर छोटी-छोटी गाठें बाँधी जाती हैं, फिर उसे रंग में डुबोया जाता है। गाठें खुलती हैं तो सफेद बूँदियाँ बच जाती हैं, और पूरा कपड़ा मरुस्थल की रात जैसा लगता है। कच्छ, बाड़मेर और जयपुर-सांगानेर के कारीगर इस काम को घणी धैर्य से करते हैं; एक बड़ी ओढ़नी में हज़ारों गाठें लग सकती हैं। मारवाड़ी घरों में बांधनी सिर्फ सजावट नहीं, पहचान भी है — शादी, तीज और त्योहार पर यह रंग और मन दोनों खोल देता है। इसमें हाथ का हिसाब, आँख की पकड़ और साँस का सब्र, तीनों चाहिए।
