चांदपोल की रजाई में फूल भी, गर्मी भी
चांदपोल के बाज़ार में सुबह की ठंड के साथ रजाइयों का ढेर भी खुल जाता है। पुरानी परिवारिक दुकानों पर हाथ से छपे फूल, पत्ते और बेल-बूटे लगे होते हैं; कपड़े पर रंग ऐसा लगता है जैसे किसी ने हाथ से सर्दी को रोक दिया हो। ये रजाइयाँ अक्सर प्राकृतिक रंग से बनती हैं, इसलिए रंग तेज नहीं, पर गहरा लगता है। काउंटर के पार बैठा दुकानदार पहले दाम बताता है, फिर खरीदार अपनी मर्ज़ी का हिसाब। घणी बार बात 100-200 रुपये पर अटक जाती है, पर दुकान की मीठी ज़ुबान से सौदा बन ही जाता है। म्हारे जयपुर में सर्दी का मज़ा भी तभी है जब रजाई घर आए और उस पर चांदपोल की मेहनत की खुशबू हो।
