चोखी ढाणी की शाम, जयपुर का आसान ठिकाना
शाम ढलते ही चोखी ढाणी में रोशनी धीमी और रंग गहरे लगने लगते हैं। कच्ची दीवारों, छोटी छतों और चौपाल-जैसी जगह पर लोग बिना जल्दी के घूमते हैं। जयपुर का दिन जो यातायात और काम में कसा हो जाता है, वह यहाँ थोड़ा सा खुल जाता है। यहीं चाय, गट्टे की सब्जी, बाजरे की रोटी और लोक गीत का साथ मिलता है। म्हारा शहर का परिवार के साथ बाहर जाने वाला मन इसी वजह से यहाँ टिकता है—न बहुत दूर, न बहुत भारी। और वह घंटी, जो कार्ड में छुपी थी, असल में ऊँट की सवारी की पुकार होती है। बच्चे उसकी आवाज सुनते ही कतार में लग जाते हैं, और बड़े लोग बस मुस्कुरा देते हैं। घणी सच्ची शाम है, जयपुर के लिए।
