एक्सप्रेसवे पर फिर नज़र, हादसे के बाद सवाल
दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे का नाम सुनते ही रफ़्तार और सीधा सफर याद आता है, पर 1 जुलाई का हादसा उसी रास्ते की सख़्ती भी याद दिला गया। बस और ट्रक की टक्कर में 8 लोगों की मृत्यु के बाद अब व्यवस्था पर फिर से सवाल उठ रहे हैं — निर्माण ठीक, पर अनुशासन कहाँ? यह सिर्फ एक सड़क का मामला नहीं, बल्कि लंबी राजमार्गों पर चलती तेज़ी और थकान का भी मुद्दा है। इसी पृष्ठभूमि में निरीक्षण की योजना आई है। ऐसे दौरों का असर तभी माना जाता है जब वह सिर्फ फ़ाइल तक न रहे, बल्कि संकेतक, लेन-शिष्टाचार और आपात प्रतिक्रिया तक पहुँचे। जयपुर से दिल्ली तक राजमार्ग पर चलने वाले लोग भी जानते हैं — एक लेन का गलत मिज़ाज पूरी यात्रा का मिज़ाज बिगाड़ देता है। सच्ची बात यह है कि एक्सप्रेसवे को सुचारु सिर्फ कंक्रीट नहीं, चलने का तरीका भी बनाता है।
