हवा महल के पीछे सवेरे की चाय
सवेरे की पहली साँस हवा महल के पीछे की पोलों में अलग ही लगती है। दुकानें अभी आधी खुली होती हैं, पर चाय की केतली से भाप उठने लगती है, और कचोरी का तेल धीरे-धीरे गरम होता है। गुलाबी दीवारों पर कालिख की हल्की परत और नयी धूप मिलकर एक नरम-सा रंग बना देती है। यहाँ गिलास छोटे नहीं, आवाज़ बड़ी होती है—खनक, फिर एक और खनक। एक चायवाला घणी साफ बात में कहता है कि सवेरे के चरम पर 47 गिलास निकल जाते हैं, इसलिए वह पहली रोशनी से ही तैयार रहता है। तब समझ आता है कि हवा महल सिर्फ देखने की जगह नहीं, जीने की सवेरे भी है। पधारो, और इस खामोश चहल-पहल को एक बार खुद महसूस करो.
