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इतिहास भूलोगे तो पहचान भी धुंधली होगी

Itihas bhoologe to pehchan bhi dhundhli hogi

जयपुर में एक विचार-मंच के दौरान हिस्ट्री और पहचान पर सीधी बात हुई। बात का सार यह था कि भारत को सिर्फ घुला हुआ देश कहना सही तस्वीर नहीं देता; यहाँ तो लंबी लड़ाई, टिकाव और लगातार सामना करने की कहानी रही है। इसी संदर्भ में यह भी कहा गया कि जो समाज अपनी हिस्ट्री से दूर होता है, वह धीरे-धीरे कमजोर हो जाता है。 यह बात सुन कर एक आम सा सवाल उठता है: स्कूल की किताब से बाहर जो याद होती है, वह कितनी बड़ी चीज़ होती है? जयपुर जैसे शहर में, जहाँ किला, हवेली और गलियों में ही इतिहास साँस लेता है, ऐसी बात सीधी लगती है। असल बात यह है कि याद रखना सिर्फ गौरव का मामला नहीं, समझदारी का भी है। और इसी पर सबकी नज़र टिक गई, क्योंकि इशारा साफ था—हिस्ट्री को हल्के में लिया, तो पहचान का रंग फीका पड़ सकता है।

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