जयपुर की बावड़ी: ठंडी हवा का रोज़ का रास्ता
तो, जयपुर की बावड़ी सिर्फ पुरानी इमारत नहीं, रोज़ का जीना भी थी। गर्मी में जब गलियाँ तपती थीं, तब इन गहरी सीढ़ियों पर उतरते ही ठंडी हवा मिल जाती थी। पानी भरने आई औरतें यहीं थोड़ा रुकती, बात करती, और बच्चे किनारे से इको सुन कर हँस पड़ते। स्टेपवेल के पत्थर पर कदम पड़ते ही आवाज़ नीचे तक डूब जाती, जैसे बारी-बारी से पूरा मोहल्ला साँस ले रहा हो। म्हारे जयपुर में बावड़ी ने पानी भी दिया, मिलन भी, और दिन का टाइम भी सेट किया। आज भी उन सीढ़ियों पर खड़े हो कर लगता है: ड्राई पिंक सिटी ने अपनी गर्मी का जवाब इसी ठंडी गहराई से दिया था।
