जयपुर की छतरियां अब घड़ियों में धड़कें
रामबाग पैलेस के महलनुमा माहौल में जो संग्रह सामने आया, उसने जयपुर की पहचान को एक नया रूप दे दिया। छतरियों की गोलाई, नगर द्वारों की बनावट और बाघ की शान — ये सब अब घड़ी के डायल और बारीकी में दिखते हैं। मतलब, जो चीज़ें हम दीवार और इमारत पर देखते आए हैं, उन्हें अब कलाई पर पहना जा सकता है। इस लोकार्पण का मज़ा यही है कि यह सिर्फ़ प्रदर्शन-भर नहीं, शिल्पकला का नया अंदाज़ है। जयपुर की स्तंभ-रचना, नक्काशी और यांत्रिक सटीकता एक साथ बैठ गए। एक तरह से यह वही बात है जो जयपुर हमेशा करता आया है — विरासत को सिर्फ़ सँभालना नहीं, उसे रोज़मर्रा की ज़िंदगी में घोल देना। बस, घड़ी देखते वक़्त एक ही ख़याल आता है: शहर की याद अब समय बताने लगी है।
