जलेब चौक की सुबह, और शटरों का संगीत
जलेब चौक में सुबह का रंग अलग ही होता है। हवा ठंडी, गलियाँ आधी खाली, और लोहे के शटर एक-एक करके खुलने लगते हैं। सबसे पहले चायवाले का चूल्हा जलता है; फिर नमकीन, कपड़े और छोटी दुकानों की कतार जाग उठती है। पुराने शहर में दिन यहीं से चल पड़ता है। आज भी एक लाल दुपट्टा वाली अम्मी हर सुबह थोड़ी देर रुकती हैं। वे किसी सामान के लिए नहीं, अपने बेटे की साइकिल का इंतज़ार करती हैं, जो स्कूल से लौटकर यहीं मिलता है। उनकी नज़र घड़ी पर कम, रास्ते पर ज़्यादा होती है। घणी सच्ची बात यही है: जलेब चौक सिर्फ बाज़ार नहीं, रोज़ का मिलन-स्थान है। यहाँ शोर भी अपना लगता है, और ख़ामोशी भी।
