जौहरी बाजार के पत्थर वाले गोलगप्पे
जौहरी बाजार की शाम होते ही पुराने शहर का रंग बदल जाता है। सोने-चांदी की दुकानों के बाद ठेलों की कतार लगती है, और एक छोटे से ठेले पर पत्थर-से ठंडे गोलगप्पे लोगों को खींच लेते हैं। पहले एक गोलगप्पा फूटता है, फिर इमली की खट्टी चटनी और धनिया-पुदीना का हरा पानी जुबान पर चढ़ता है। भाईसाहब, यही जयपुर का असली रूप है — खड़े-खड़े बात, हँसी, और दूसरे की प्लेट की तरफ देखना। इन गोलगप्पों का खास राज उनका बिलकुल ठंडा, सख्त खोल है, जो गरम शाम में और भी अलग लगता है। लोग सबसे ज्यादा उस पल का इंतजार करते हैं जब ठेले वाला एक और गोलगप्पा बिना पूछे प्लेट में रख देता है।
