जोहरी बाजार की सुबह, चाँदी और नींद
जोहरी बाजार की सुबह बिलकुल अलग लगती है। धूप अभी सीधी नहीं पड़ती, बस पतली सी रेख बनकर पत्थर की दीवार पर चढ़ जाती है। कुछ दुकानों के शटर आधे उठे होते हैं, कुछ अभी भी नींद में। चाँदी के टोकरा ढककर रखे होते हैं, और लाख के छोटे डिब्बे एक तरफ सजाए जाते हैं, जैसे कोई पुराना हिसाब खोलने वाला हो। यहीं जयपुर की असली धड़कन दिखती है: भागते लोग नहीं, बल्कि धीरे खुलते हाथ। एक दुकान का मालिक पहली चाय के बाद ही माल साफ करता है, दूसरा अपने हिसाब की कॉपी खोलता है। घणी सच्ची बात ये है कि जोहरी बाजार की सुबह में शोर से ज़्यादा इंतज़ार होता है। और जो पहला शटर उठता है, उसके साथ पूरा बाजार जाग जाता है।
