किशनपोल बाज़ार: लकड़ी और हुनर की गली
किशनपोल बाज़ार की इस गली में लकड़ी सिर्फ माल नहीं, रोज़गार है। सुबह से दुकानों के बाहर तख्ते, चौखट, खिड़की के फ्रेम और नक्काशीदार टुकड़े लगे रहते हैं। कहीं बड़ी कारखाने से आया सामान, कहीं घर के कारीगर का हाथ, दोनों का अपना भाव। दुकानदार बोलते हैं, यहाँ भाव पूछने से पहले नज़र चलती है — रेशा देखकर ही काम समझ आता है। एक कोने में एक परिवार की दुकान पर 12 दरवाज़ों के पत्ते रखे थे। खरीदार ने उनमें से सिर्फ दो चुने, क्योंकि उसके घर के लिए पूरे सेट की ज़रूरत नहीं थी। बस इतना ही यहाँ का खेल है: ज़रूरत, नाप और मोलभाव। घणी सच्ची बात है, किशनपोल में हर टुकड़ा अपनी कहानी बेचता है।
