लोहार बाज़ार में पीतल के बरतनों की धुन
लोहार बाज़ार की तंग गली में पीतल और ताँबे के बरतन दीवार से दीवार तक चमकते हैं। कहीं थालियों पर हाथ की ठोक, कहीं लोटों की घिसाई, और किसी कोने में कलई चढ़ाने का काम चलता है। यहाँ मशीन से बने सामान से ज़्यादा भरोसा उस बरतन पर है जो सालों तक घर के काम आए। एक पुराना दुकानदार बताता है कि उसके पास आज भी उन्हीं घरों से ऑर्डर आते हैं जहाँ दादी-नानी के ज़माने के देगचे और हाँडी संभाल कर रखे गए हैं। घणी बात तो यह है कि लोग सिर्फ़ बरतन नहीं, एक आदत खरीदते हैं। लोहार बाज़ार का यह काम जयपुर की उस रफ़्तार को रोक कर दिखाता है जहाँ धातु, मेहनत और याद एक साथ टिकते हैं।
