मंगणियार: थार के विरासती गायक
बाड़मेर और जैसलमेर की धूल में मंगणियार की आवाज़ अलग ही पहचान रखती है। ये मुस्लिम क़ौम के पीढ़ी-दर-पीढ़ी कलाकार हैं, जिनकी पेशेवार विरासत सदियों से चलती आई है। राजपूत और चारण जजमान इन्हें सहारा देते रहे, और बदले में ये गीत, कहानी और रागों का खज़ाना सौंपते रहे। इनके गीत सिर्फ़ महफ़िल का शोर नहीं; उनमें इंसान, रेगिस्तान की हवा, पंछी और मुक्ति तक की बात होती है। घणी देर तक सुनो तो लगता है जैसे थार खुद बोल रहा हो। खास बात यह है कि कुछ मंगणियार राग उत्तर भारतीय शास्त्रीय परंपरा में नहीं मिलते; वे इसी मिट्टी की देन हैं। सच्ची, ऐसी विरासत को सँभालना भी एक इबादत जैसा काम है।
