मुहाना मंडी की सुबह, एक अलग ही नाटक
मुहाना मंडी में सूरज निकलने से पहले ही रौनक जम जाती है। ठेले पर हरी मिर्च चमकती है, पालक के गुच्छे गीले कपड़े में बंधते हैं, और मूली की मिट्टी अभी तक साथ होती है। सब्जी वाले जल्दी में भी अपनी दुकान सजाते हैं, जैसे रोज़ का रंगमंच हो। यहीं असली खेल शुरू होता है: भाव पूछने वाला ग्राहक, तौल करने वाला व्यापारी, और पीछे से आती साइकिल की घंटी। एक ठेले पर 12 रुपये सुन कर रुका ग्राहक इसी लिए था, क्योंकि उस सुबह धनिये का भाव आम से ऊपर चला गया था। म्हारे जयपुर में सुबह का ये दृश्य सिर्फ खरीद-बिक्री नहीं, रोज़ की धड़कन है। घणी ठंडी हवा में भी मंडी गरम रहती है—सच्ची, जैसे शहर का पेट यहीं से भरता हो।
