मुहाना मंडी की सुबह का नाटक
मुहाना मंडी में अँधेरा अभी पूरी तरह गया भी नहीं होता, और सब्ज़ियों की दुनिया जाग चुकी होती है। ठेलों पर गोभी के सफेद फूल, धनिए की हरी गड्डियाँ, और टमाटर की लाल चमक एक अलग ही रंगमंच बना देती है। मुँह धोते आदमी, ताज़ी घास-सी खुशबू, और तराज़ू की टिक-टिक — बस यही सुबह का राग है। यहाँ हर कोई अपनी भाषा में बात करता है: कोई भाव घटाता, कोई ताज़ा माल देखकर सीधे हाथ बढ़ाता। एक छोटा सा लड़का, जो पहली बार मंडी लाया गया लगता है, टमाटर के ढेर को देखकर बस हाँ कर देता है — क्योंकि उसके घर में आज दाल के साथ सब्ज़ी पकनी है। मुहाना की यह रोज़ की रंगत जयपुर को याद दिलाती है: शहर का पेट भी सुबह ही भरना शुरू होता है, घणी सच्ची बात।
