मुंबई से वाराणसी तक, पैदल शहर का मजा
शहर को गाड़ी की खिड़की से देखना अलग बात है, और पैदल चलकर महसूस करना अलग। मुंबई से वाराणसी तक ऐसे कई स्थान हैं जहाँ यातायात के शोर के बीच भी पुरानी गलियाँ, किनारे के रास्ते और बाजार की भिनभिन अपनी कहानी सुनाते हैं। कहीं औपनिवेशिक दौर की गलियाँ मिलती हैं, कहीं तट-रेखा पर ठंडी हवा, और कहीं मोहल्ले का वह छोटा-सा मोड़ जहाँ चाय और बात दोनों गरम मिलते हैं। यही इस सफर का मजा है — गति नहीं, नजर। पैदल चलने योग्य शहर का मतलब सिर्फ आसानी नहीं, बल्कि हर मोड़ पर एक नया रंग। कोई शहर अपनी वास्तुकला से पकड़ता है, कोई अपने बाजार से, और कोई बस इसलिए याद रह जाता है क्योंकि वहाँ चलना ही एक अनुभव बन जाता है। सच्ची बात, शहर को समझना हो तो कभी-कभी पैरों को ही स्टीयरिंग बनाना पड़ता है।
