पंचायत चुनाव की घड़ी फिर अटकी
राजस्थान में पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव की देरी अब सिर्फ़ दफ़्तर की बात नहीं रही, सीधे अदालत के दरवाज़े तक पहुँच गई है। उच्च न्यायालय ने सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग के रुख़ पर नाराज़गी दिखाई, क्योंकि चुनाव की घोषणा और आगे की तैयारी अब तक साफ़ नहीं हो पाई है। गाँव की चौपालों से लेकर शहर के मोहल्लों तक एक ही सवाल घूम रहा है — वोट देने का मौका कब मिलेगा? ऐसे मामलों में देरी का असर सीधे स्थानीय काम पर पड़ता है, क्योंकि वार्ड, सफ़ाई, पानी और छोटी-बड़ी ज़िम्मेदारियों की बात भी आगे बढ़ नहीं पाती। लोगों की बोली में बस इतना सा मतलब है: व्यवस्था चलनी चाहिए, पर यहाँ फ़ाइल ही फ़ाइल घूम रही है। अब सबकी नज़र इस बात पर है कि आयोग आगे क्या सफ़ाई देता है और चुनाव कैलेंडर पर कौन-सी पक्की बात आती है।
