पन्ना मीना का कुण्ड की खामोश ज्यामिति
सुबह के खामोश वक्त पन्ना मीना का कुण्ड बस एक सीढ़ीदार कुआँ नहीं लगता, एक सीधी हुई तस्वीर लगता है। हरे-पत्थर की ज्यामिति, एक के ऊपर एक उतरती सीढ़ियाँ, और बीच का खुला-सा आँगन — सब मिलकर आँख को ठहरा देते हैं। जयपुर में ऐसे पल कम मिलते हैं जब कोई जगह बोलती हो और आदमी चुप हो जाए। पधारो के माहौल में यहाँ के पास खड़े होकर बस देखना ही काफी है। कभी कोई स्कूल का बच्चा छोटा-सा समूह बनाकर रुकता है, कभी कोई मेहमान बस एक तस्वीर लेकर आगे बढ़ जाता है। पर असली बात उस चायवाले की है जो रोज़ 7 घंटे यहीं बैठता है — इसी से इस खामोशी में घर जैसी आदत आ गई है। घणी देर तक रुकने का मन करता है, सच्ची।
