संसद की बात पर शोर, काम पर फिर सवाल
संसद के मानसून सत्र में एक अजीब-सी तस्वीर बनी: एक तरफ संविधान का हवाला, दूसरी तरफ सदन की चलती बात को रोकता शोर। वित्त मंत्री ने यही बात उठाई कि जो लोग नियम और संविधान की बात करते हैं, उनसे पहले सदन को चलने देने की उम्मीद होती है। इस बीच 12 विधेयक पारित हो गए, पर लंबी बहस का मौका छोटा पड़ गया। यहाँ असली मुद्दा सिर्फ एक सत्र का नहीं, बल्कि संसदीय आदत का है। जब चर्चा के बदले व्यवधान ज़्यादा दिखे, तो आम आदमी को लगता है कि काम की गति कम हो रही है। गृह मंत्री ने आने वाली चर्चा में विस्तृत जवाब का संकेत दिया है, और तिरंगा यात्रा को मिल रही भीड़ ने भी राजनीतिक माहौल को गरम रखा है। बस अब नज़र इस पर है कि अगली बैठक में बात का रास्ता खुलता है या फिर फिर से वही रुकावट।
