पटवों की हवेली का नक्काशीदार जाल
पटवों की हवेली जैसलमेर की पीली गलियों में वह जगह है जहाँ पत्थर भी कपड़े जैसा लगता है। बाहर से सीधी-सी दीवार, अंदर जाते ही झरोखों का जाल, बारीक नक्काशी और तंग राहें। धूप जब इन नक्काशियों पर पड़ती है, तो छाया भी नमूना बन जाती है। यह हवेली असल में एक व्यापारी परिवार की पाँच हवेलियों का समूह है, इसलिए इसका भूलभुलैया जैसा अहसास और गहरा हो जाता है। यहाँ घूमते हुए हर मोड़ पर नया दृश्य मिलता है—कहीं छत की दीवार पर कारीगरी, कहीं खिड़की से बाज़ार की हल्की चहल-पहल। घणी सच्ची बात, जैसलमेर का यह स्थान सिर्फ देखने का नहीं, धीरे से महसूस करने का है। रुककर देखो, पत्थर भी कहानी सुनाता है।
