पोलियो अभियान से घर-घर वाली याद फिर ताज़ा
जयपुर में पल्स पोलियो अभियान की शुरुआत एक साधारण-सी क्रिया से हुई — छोटे बच्चों को पोलियो की खुराक दी गई, और पूरे राज्य के लिए समय का संदेश साफ था। ऐसे अभियानों में नाटकीयता कम, अनुशासन अधिक होता है। बस एक छोटा-सा अंतर भी रह जाए, तो सुरक्षा की कड़ी कमजोर पड़ सकती है। इसीलिए ध्यान केवल आरंभ पर नहीं, उसके बाद की दिनचर्या पर होता है: घर में याद दिलाना, बूथ तक ले जाना, और जो परिवार एक बार चूक जाए, उसे फिर से जोड़ना। आधिकारिक आवास से निकला यह संकेत असल में उन्हीं गलियों तक पहुँचता है जहाँ सुबह का काम, स्कूल की तैयारी और रोज़मर्रा की भागदौड़ के बीच स्वास्थ्य की बात अक्सर पीछे रह जाती है। सच्ची बात यही है — पोलियो का मुद्दा सुर्खी से ज्यादा आदत का है। घणी देर तक याद रखी जाने वाली चीज़ भी वही है: एक बूँद, और पूरी ज़िम्मेदारी।
