रजाई, शादी और घेवर का जयपुर मूड
सर्दी की हल्की-सी कंपकंपी के साथ जयपुर अब शादियों के रंग में दिखने लगता है। घरों में रजाइयाँ अभी भी बिस्तर पर भारी पड़ी होती हैं, पर रसोई में घी गरम हो रहा होता है। माँ के हाथ से घेवर का गोला छत्ता बनता है, और पड़ोस से खुशबू आकर सीधे दिल तक पहुँचती है। गली के बाहर स्कूटर रुकते ही लोग पूछते हैं — इस बार कितने किलो घेवर मँगवाए? क्योंकि शादी का हिसाब सिर्फ कपड़ों से नहीं, मिठाई के डिब्बों से भी होता है। घणी सर्दी में गरम चाय और घेवर का जोड़ा बिल्कुल जयपुर जैसा लगता है: सीधा, मीठा, और थोड़ा-सा शौक वाला। म्हारे यहाँ सर्दी का मतलब बस ठंड नहीं, तैयारी भी है। बस इतना ही।
