आरक्षण पर गुस्सा, वोट का नया हिसाब
नागपुर, लखनऊ, जयपुर और विशाखापत्तनम जैसे शहरों में आरक्षण-विरोधी प्रदर्शनों की खबर आई है, और ऑनलाइन भी जाति-आधारित कोटे के खिलाफ अभियान तेज़ी पकड़ रहा है। यह कोई छोटा मूड स्विंग नहीं, बल्कि चुनाव से पहले बन रहा एक बड़ा राजनीतिक संकेत लगता है। जब विधानसभा चुनाव नज़दीक आते हैं, तब ऐसे मुद्दे सीधे वोट-बैंक और प्रतिनिधित्व की बहस को छू लेते हैं। जयपुर में भी लोग इस बात पर बात कर रहे हैं कि कोटे का मुद्दा हर बार अंकों से आगे निकल जाता है — एक तरफ सामाजिक न्याय की बात, दूसरी तरफ असर और मौके की चिंता। करणी सेना का नो वोट वाला संदेश इसी तनाव को और तेज़ करता है। सच्ची बात यह है कि आरक्षण सिर्फ नीति नहीं, देश की सबसे संवेदनशील गिनती में से एक है। इसलिए हर नया विरोध पुरानी लकीर को फिर से खींच देता है।
