सफाई कर्मियों की भूख-हड़ताल से शहर का मूड टाइट
सफाई कर्मियों की भूख-हड़ताल ने एक बार फिर वही पुराना सवाल सामने ला दिया है — जब काम चल रहा हो, तो नई भर्ती की बात इतनी देर से क्यों आती है? जहां रोज सुबह गलियों, मोहल्लों और बाजारों को साफ रखने की जिम्मेदारी इन्हीं कंधों पर टिकती है, वहीं रिक्रूटमेंट की मांग को लेकर धरना अब काफी सख्त रंग ले चुका है。 शहर के डेली रूटीन में सफाई का काम वह चीज है जो दिखती कम है, पर महसूस सबसे पहले होती है। भूख-हड़ताल का मतलब सिर्फ प्रोटेस्ट नहीं, बल्कि एक ऐसी थकान का सिग्नल है जो काफी दिनों से जमा हो रही थी। एक वर्कर ने साफ अंदाज में बोला — जब काम बढ़ता जाए और लोग कम पड़ते जाएं, तो आवाज उठानी पड़ती है。 अब नजर इस पर है कि बात सिर्फ मांग तक सिमटती है या कोई प्रैक्टिकल रास्ता निकलता है। जयपुर जैसे शहर में, जहां सफाई रूटीन का सबसे बड़ा हिस्सा है, यह मसला बस एक डिपार्टमेंट का नहीं लगता — यह पूरे शहर की सुबह से जुड़ा हुआ सवाल है।
