स्कूल सिर्फ पढ़ाई नहीं, देखना भी सिखाए
स्कूल का काम सिर्फ पाठ्यक्रम पूरा कर देना नहीं होता। बच्चे रोज़ कक्षा में समीकरण, अध्याय और गृहकार्य का बोझ उठाते हैं, पर असली ज़िंदगी में उन्हें देखना, समझना और सवाल करना भी आना चाहिए। यही बात सिनेमा-जैसी कक्षा के विचार को महत्वपूर्ण बनाती है। फ़िल्म, दृश्य और दृश्यात्मक कथन बच्चे को यह सिखाते हैं कि एक फ़्रेम में कितनी बात छिपी हो सकती है — छोटी-सी नज़र, किसी का मौन, या पृष्ठभूमि में चल रहा कोई बदलाव। जयपुर जैसे शहर में, जहाँ गैलरी, स्कूल और मोहल्ला सब एक-दूसरे से जुड़े हैं, ऐसी शिक्षा और भी काम की है। बच्चा बस उत्तर रट न ले, संदर्भ भी समझे — यही सच्ची शिक्षा है। जैसे कक्षा में शिक्षक कहता है, सब कुछ किताब में नहीं होता, वैसे ही जीवन को देखने की आदत भी पढ़ाई का हिस्सा होनी चाहिए। घणी सीधी बात है: जो बच्चा दुनिया को ठीक से देखना सीख गया, वह उसे ठीक से समझना भी सीख जाएगा।
