बंधनी दुपट्टा: घणी धीरज का रंग
जयपुर के हाथ से बनी बंधनी दुपट्टा सिर्फ कपड़ा नहीं, सब्र का काम है। पहले रेशम या सूती कपड़े पर छोटे-छोटे गाठे बाँधे जाते हैं, फिर रंग चढ़ता है, और बाद में धागे खोलकर डिज़ाइन निकाला जाता है। सांगानेर और पुरानी बस्ती के आसपास ऐसी कारीगरी आज भी दिखती है, जहाँ औरतें और कारीगर दिन भर बैठकर उँगलियों से नए छोटे निशान रचते हैं। इसमें जल्दी का कोई काम नहीं, बस धैर्य और साफ नज़र चाहिए। घणी बार एक दुपट्टा देखकर लगता है कि बस सुंदर है, पर असल में उसमें घंटे नहीं, पूरा दिन छुपा होता है। जयपुर में बंधनी इसलिए भी अपनी लगती है—क्योंकि यह शोर नहीं, मेहनत से चमकती है।
