बापू बाज़ार: दाम से ज़्यादा बात बिकती है
बापू बाज़ार में सुबह से शाम तक एक अलग ही नाटक चलता है। कपड़े, जूती, कंगन, या मसाले — जो भी देखो, पहले दाम नहीं, बात बनती है। दुकानदार आँख से पहचान लेता है कि ग्राहक गंभीर है या सिर्फ घूम रहा है। फिर शुरू होती है वह रोज़ की खेल-बात: “इतना ही?” “अरे भाइसाब, इतना में तो बस पैकिंग आएगी।” असली मज़ा तो बीच के ठहराव में है, जब ग्राहक चुप हो और दुकानदार भी। दो मिनट की इस खामोशी में ही नया दाम जन्म लेता है। बापू बाज़ार का नियम सीधा है — जो चीज़ कम बिकती है, उसकी बात ज़्यादा चलती है। घणी सच्ची बात: जयपुर में कभी-कभी खरीदारी से पहले संवाद का टिकट लगता है।
