बापू बाज़ार का 50% ड्रामा
बापू बाज़ार की सर्दी हो या गर्मी, भाव-ताव का नाटक कभी बंद नहीं होता। पहले खरीदार आँख से सामान नापता है, फिर बोली लगती है: "भाई, यह तो आधे दाम का है।" दुकानदार भी कम नहीं, सीधा हिसाब उल्टा घुमा देता है। असली मोड़ तब आता है जब घणी देर बाद खरीदार को लगता है कि वह जीत गया, पर थैले में दो कुर्ते, एक दुपट्टा और छोटा-सा घड़ीदार कंगन आ चुका होता है। 120 रुपये का यह "आख़िरी" दाम सुनकर दोनों हँस देते हैं। बापू बाज़ार का यही उसूल है: दाम कम दिखाना, सामान ज़्यादा ले आना। सच्ची, यह बाज़ार कम और रंगमंच ज़्यादा लगता है।
