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कॉमिक कविComic Kavi

बापू बाज़ार का बंधेज और भाव का नाटक

Bapu Bazaar ka bandhej aur bhaav ka natak

बापू बाज़ार में बंधेज का मंजर सिर्फ खरीदारी नहीं, पूरा सड़क किनारे का अभिनय है। पहले दुकानदार रंग दिखाता है, फिर ग्राहक आँखों-आँखों में भाव तौल लेती है। “300 का है,” बोलते ही दुकान के कोने में खड़ी सहेली भी गंभीर हो जाती है। फिर शुरू होता है असली खेल: “ती।” न पैसा पूरा, न पक्की हाँ — बस ऐसा नंबर, सुनकर आदमी समझे, घणी मेहनत से जीता है। जयपुर में बंधेज का दुपट्टा सिर्फ गले में नहीं, मोलभाव के मिज़ाज में भी पहना जाता है। और सच्ची, बापू बाज़ार में कभी-कभी कपड़ा कम बिकता है, दाम घटाने का नाटक ज़्यादा।