बापू बाज़ार का लास्ट प्राइस ड्रामा
बापू बाज़ार में सौदा सिर्फ़ माल का नहीं, बात का भी होता है। पहले दुकानदार बोलता है, “घणी सस्ती चीज़ है,” और ग्राहक सीधे आता है, “भाईसाब, इतनी भी क्या ख़ास?” फिर दोनों के बीच लास्ट प्राइस का खेल शुरू। एक तरफ़ कुर्ता टाँग पर, दूसरी तरफ़ जेब पर हाथ। यहीं जयपुर की असली अदा दिखती है: दाम कम करवाने में शर्म नहीं, और मुस्कराहट में भी कोई कमी नहीं। कभी 1200 से शुरू हुआ सौदा 700 तक आता है, और कभी 650 पर छुट्टी। बापू बाज़ार का मज़ा यही है—यहाँ “फाइनल” का मतलब बस नई शुरुआत होता है। सही कि गलत?
