बापू बाज़ार के लच्छा चूड़ियों का नया ड्रामा
बापू बाज़ार में लच्छा चूड़ियाँ देखते ही लगता है जैसे रंगों ने लाइन लगा दी हो। एक तरफ लाल, दूसरी तरफ हरी, और बीच में सुनहरी चमक—कौन सी पहनूँ, कौन सी छोड़ूँ, यही असली झंझट। दुकान पर खड़ी दीदी बोलती हैं, “बस दो और, घणी जँचेंगी,” और भाईसाहब दाम सुनते ही थोड़ा सा और झुक जाते हैं। फिर आता है घर ले जाने का बड़ा खेल। थैली में डालकर, कपड़े में लपेटकर, सब लोग उन्हें ऐसे पकड़ते हैं जैसे तीज की तैयारी नहीं, शीशे का खज़ाना हो। असली टेंशन ये है कि रात को डिब्बे से निकालते वक्त पहली चूड़ियों की आवाज़ न आ जाए। जयपुर की यही अदा है—नज़ाकत भी, नखरा भी।
