बापू बाजार की मोलभावबाज़ी, पूरा नाटक
बापू बाजार में खरीदारी कभी सीधी-सादी बात नहीं होती। पहले दुकान वाले की मुस्कान, फिर ग्राहक का “थोड़ा और कम करो”, और बीच में पूरा मंच सज जाता है। एक कुर्ता देखने गए थे, पर मोलभाव ने ऐसा माहौल बनाया जैसे आखिरी दृश्य चल रहा हो। तरीका वही: ग्राहक दो कदम निकलता है, दुकानदार “अरे भाई, रुक” बोलता है, और दाम नीचे आ जाता है। फिर अचानक एक अतिरिक्त दुपट्टा हाथ में आ जाता है — “इसे तो साथ ही ले लो, घणी सस्ती है।” जयपुर की इस बाज़ारी नाटकबाज़ी में जीत हमेशा एक जैसी नहीं होती, पर हँसी पक्की होती है। और सच्ची, घर पहुँचकर डिब्बा खोलते ही सबसे पहले वही दुपट्टा दिखता है।
