बापू बाज़ार में दाम का ड्रामा
बापू बाज़ार में खरीदारी कम, नाटक ज़्यादा लगता है। दुकानदार पहली ही पंक्ति में कपड़े को “बेहतरीन” बना देता है, और खरीदार का चेहरा ऐसा कि जैसे उसने बस एक दुपट्टा नहीं, पूरा महल देख लिया हो। फिर शुरू होती है भाईसाहब वाली बात: “इतना? अरे, कल ही तो इससे आधे में लिया था।” यहीं जयपुर का रंग है। छोटी सी गद्दी, दो चाय के घूँट, और दाम पर घणी लंबी बात। आखिर में जो हाथ मिलता है, वह सिर्फ खरीद-बिक्री नहीं होता; एक छोटी जीत का मीठा सा एहसास होता है। बापू बाज़ार का नियम सरल है: पहली क़ीमत कहानी होती है, अंतिम दाम सुकून।
