चुनरी बाजार में भाव का नशा
चुनरी बाजार में सुबह की धूप तेज हो, तब भी ठंडक का झोल मिल ही जाता है — छत के नीचे खड़ी औरत, हाथ में रंग-बिरंगी चुनरी, और सामने दुकानदार का सीधा चेहरा। पहली बात होती है, "घणी सस्ती नहीं।" दूसरी बात होती है, "भाईसाब, इतनी भी क्या देर।" और तीसरी बात पर 300 वाली चुनरी 180 में घर जाने को तैयार। यह जयपुर है, यहाँ भाव भी तहजीब से लगता है। गली के कोने पर चाय, बीच में खनकती हँसी, और म्हारे यहाँ की मोलभाव में जीत तब होती है जब दोनों तरफ से मुस्कान बच जाए।
