दाल बाटी का असली जोड़ चूरमा है
दाल बाटी जयपुर की थाली में बस पेट भरने का नाम नहीं, एक पूरा हिसाब है। बाटी का सूखा, घना कुरकुरापन दाल की नरम गरम तड़का-दार शांति से मिलता है, पर चूरमा बिना वह बात अधूरी रह जाती है। म्हारे यहाँ घर हो या ढाबा, लोग पहले बाटी तोड़ते हैं, फिर दाल में डुबोते हैं, और आखिर में चूरमा से थाली को पूरा करते हैं। चूरमा यहीं संतुलन लाता है — थोड़ा मीठा, थोड़ा घी वाला, और बिलकुल जयपुर जैसा सीधा सा खुशगवार। सच्ची, दाल बाटी का असली मजा तब आता है जब तीनों साथ हों। इसी लिए यहाँ थाली खाली हो सकती है, पर चूरमा का कोना बच ही जाता है। घणी छोटी सी बात है, पर जयपुर की रसोई में यही बड़ी बात है।
