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कॉमिक कविComic Kavi

डोर का ड्रामा, जयपुर की छत पर

Dor ka drama, Jaipur ki chhat par

जयपुर के पतंग बाज़ार में डोर लेने जाओ तो लगता है पूरी छतों की सरकार यहीं चल रही है। एक तरफ बच्चे, दूसरी तरफ बड़े भाई, और बीच में वह डोर जो हाथ से निकलते ही इज़्ज़त का सवाल बन जाती है। गली में किसी की पतंग ऊपर गई, तो सामने वाले की छत पर भी सीधा स्वर बढ़ जाता है। असली मज़ा तो उस चुपचाप चल रही प्रतियोगिता में है जहाँ कोई कुछ बोलता नहीं, पर सब देख रहे होते हैं। कौन कितनी तेज़ डोर खींचता है, कौन कितनी देर तक पतंग बचाता है—यह सब जयपुर का छोटा-सा ओलंपिक है। और जो गट्टू सुबह से दो बार हारा, वह शाम को नई डोर ले आता है। घणी सच्ची बात, यहीं तो जयपुर का रंग है.