एक दरवाज़ा, पूरा पोल
जयपुर के पोल-हाउस गली में एक दरवाज़ा सिर्फ़ दरवाज़ा नहीं रहता। सुबह वह खुलता है तो साथ में चाय की ख़ुशबू, बच्चों की दौड़, और पड़ोस के दो-चार सवाल भी निकल आते हैं। शाम को वही कुंडी फिर से लगती है, पर मोहल्ला बंद नहीं होता — आवाज़ भीतर ही भीतर चलती रहती है। यही पोल की खूबी है: एक घर का मुख्य दरवाज़ा पूरे गली का रास्ता बन जाता है। कौन आया, कौन गया, किसकी तबियत ठीक नहीं, किसके घर आज पकौड़े बने — सब इसी एक ठहराव पर टिकता है। घणी सच्ची बात है, जयपुर के इन पुराने मोहल्लों में निजता कम, अपनापन ज़्यादा मिलता है। और दरवाज़े पर लगी वह पीली निशानी? वह बस रंग नहीं, उस घर की पहचान और गली की याद है।
