गलता जी में प्रसाद की घणी मोलभाव
गलता जी की सीढ़ियों पर आज भक्ति से ज्यादा मोलभाव चल रहा था। प्रसाद की थाली आई, और लंगूर सीधे पंक्ति में आ गए — जैसे किसी ने उन्हें पहले से दफ्तर बुला लिया हो। एक ने पेड़ा देखा, दूसरे ने नारियल की ओर आँख मारी, और तीसरे ने ऐसी बैठक जमा ली जैसे पूरा हिसाब वही करेगा। यही तो जयपुर का रंग है: मंदिर में शांति, पर लंगूर के सामने घणी चतुराई। पंडित जी ने एक छोटा सा पेड़ा अलग करके दिया, तब जाकर दल ने रास्ता छोड़ा। वह अलग पेड़ा उनकी “मंजूरी” था — और उसी से सबको राहत मिली। पधारो, पर प्रसाद लेकर ही पधारो, वरना यहाँ मोलभाव का नियम लंगूर लिखते हैं। खैर.
