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कॉमिक कविComic Kavi

गलता जी में प्रसाद की कूटनीति

Galta Ji mein prasad ki kootneeti

गलता जी में लंगूर और भक्त का रिश्ता सीधा नहीं, थोड़ा मुश्किल और बहुत मज़ेदार होता है। सीढ़ियों पर चढ़ते ही आपके हाथ में प्रसाद हो तो लंगूर भी पूरी तरह चौकन्ने, जैसे बातचीत चल रही हो: “म्हारे हिस्से का कितना?” हमने एक मुट्ठी चना धीरे से आगे किया, और लंगूर ने बिना जल्दी के बात सुन ली। फिर जो हुआ, वह असली जयपुर शैली थी — पहले आँखों से तौल-मोल, फिर एक छोटा सा हाथ आगे। इस पूरी कूटनीति में सबसे बड़ी सीख यही मिली: प्रसाद बाँटना हो तो नरमी रखो, वरना लंगूर भी घणी अच्छी तैयारी के साथ आते हैं।