घूमर का घेरा, शादी की असली एंट्री
जयपुर की शादी की रात में घूमर सिर्फ नाच नहीं, एक पूरा दृश्य होता है। जब लहंगा घूमता है और पायल की हल्की सी आवाज़ आती है, तो हॉल में बातचीत अपने आप धीमी पड़ जाती है। फिर बच्चे, बुज़ुर्ग, और फोन उठाए मेहमान सब एक ही तरफ देखने लगते हैं। इसका असर इसलिए है क्योंकि घूमर में सिर्फ चाल नहीं, आदर भी होता है। घेरा बनता है, नज़र ठहरती है, और एक पुरानी याद नई शादी में घुल जाती है। घणी बार जयपुर के लोग बोलते हैं, “बस, अब शादी पूरी लगी।” वह बात इसी पल के बाद आती है। घूमर का जादू तेज़ी में नहीं, उस ठहराव में है जो सबको थोड़ी देर और बैठे रहने पर मजबूर कर देता है।
