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गोलगप्पे की पहली प्लेट, और जयपुर का ड्रामा

Golgappa ki pehli plate, aur Jaipur ka drama

गोलगप्पे के ठेले पर पहली प्लेट बस खाना नहीं होती, पूरा अभ्यास होती है। ठेला लगते ही घर के लोग, दफ़्तर वाले, और कॉलेज के यार एक कतार में खड़े हो जाते हैं। पहला गोलगप्पा आते ही सबका चेहरा देखने लायक होता है — कोई तीखापन सह लेता है, कोई तुरंत पानी ढूँढता है, कोई बोलता है “बस बस,” पर हाथ फिर भी प्लेट की तरफ जाता है। यहीं पर जयपुर का असली मजा है। म्हारे यहाँ पहली प्लेट से ही तय हो जाता है कि आगे तीन लेनी हैं या बस यहीं से निकलना है। ठेले वाला भाईया भी सब समझ जाता है: किसने नखरा किया, किसने सच में मज़े से खाया। इसलिए पहली प्लेट प्रदर्शन लगती है — और उसका नतीजा दूसरी प्लेट का फैसला।