जयपुर का ऑटो मीटर: पुराण का पाठ
जयपुर में ऑटो वाले का मीटर सिर्फ मशीन नहीं, पुराण जैसा महाग्रंथ लगता है। कभी चल पड़ा, कभी सो गया, कभी सीधा बोलता है, “भैया, मैं मन में नहीं हूँ।” छोटी सी सवारी, पर किराए का हिसाब ऐसा कि आदमी को पहले अपनी याददाश्त पर शक हो। पिंक सिटी की गर्मी में जब ऑटो रुकता है, तब मीटर की सुई को देखकर लगता है जैसे कोई छोटा सा जादू चल रहा हो। चालक हँसते-हँसते बोल देता है, “मीटर ठीक है, बस उसका स्वभाव अलग है।” और म्हारे जयपुर में यह बात भी चल जाती है। इसलिए सवारी पहले दर पूछती है, फिर बैठती है। सच्ची, इस मीटर का सबसे बड़ा राज़ यही है: 27 रुपये की शुरुआत, और उसके बाद जो चला, सो चला।
