जयपुर का पोल: शहर का असली लिविंग रूम
पोल में कोई अलग हाल नहीं, पर पूरा शहर का लिविंग रूम मिल जाता है। सुबह एक तरफ दूध वाला, दूसरी तरफ स्कूल का बैग, बीच में चबूतरे पर दो बुज़ुर्ग और उनकी धीमी बात। दोपहर को छाया बदलती है, तो बच्चे दीवार से टिक कर गपशप करते हैं। शाम होते ही पोल का रंग और गहरा हो जाता है—कोई चाय ले आता है, कोई सब्ज़ी, कोई बस दो मिनट बैठने। म्हारे जयपुर में यह सिर्फ रास्ता नहीं, रोज़ का मिलना-जुलना है। इसलिए पोल का असली मज़ा उसके यातायात में नहीं, उस रोज़ की आदत में है जो सबको एक ही जगह बिठा देती है।
