जयपुर की दुकानें अब भी पत्ते पर क्यों टिकी हैं
ओल्ड सिटी की गलियों में दुकान का हिसाब कभी स्क्रीन पर इतना सुकून नहीं देता जितना एक सीधा पत्ता। किराना हो, कपड़े हों या मसाला—मालिक पीले कागज पर नाम, रकम और तारीख लिख देता है। बस, काम खत्म। यहाँ कंप्यूटर आया, पर हाथ की लिखाई गई नहीं। इसका राज सीधा सा है: पत्ता तुरंत समझ आता है, बदलना आसान है, और आदमी से आदमी का रिश्ता भी दिखाता है। एक पंक्ति में उधार भी, आज का सामान भी, और कल का भरोसा भी। घणी बार दुकान के बाहर खड़े ग्राहक को बस एक नज़र चाहिए होती है—और वही काम हाथ से लिखी लेद कर देती है। जयपुर की इस आदत में थोड़ा पुराना हिसाब है, थोड़ा नया विश्वास।
