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जयपुर की कठपुतली: छोटी दुनिया, बड़ी बात

Jaipur ki Kathputli: chhoti duniya, badi baat

पहले एक छोटा सा स्टेज बनता है, फिर कारीगर की उंगलियों में धागे हिलते हैं और कठपुतली सीधी खड़ी हो जाती है। जयपुर में यह कला बस बच्चों का तमाशा नहीं, घणी पुरानी कहानी सुनाने का तरीका है। गांव की बात हो या शहर की, पुतलों के थ्रू सीधा सा संदेश भी मज़ेदार लगता है। इसमें लकड़ी, कपड़ा और आवाज़ — तीनों मिलकर काम करते हैं। रंग-बिरंगे पुतले, थोड़ा सा तबला या ढोलक, और एक नाटक जैसा रिदम। म्हारे जयपुर में ऐसी कला को देखकर लगता है कि बिना बड़े सेट के भी पूरी दुनिया रची जा सकती है। सच्ची, कठपुतली का असली जादू उस पल में है जब खामोश पुतला भी अपनी बात कह देता है.