जयपुर की पोल: घर से ज़्यादा गली क्यों लगती हैं
पुरानी जयपुर की पोलें देखने में बस तंग गलियाँ लगती हैं, पर भीतर एक पूरा जीवन चलता है। सुबह पड़ोसी की खिड़की से चाय की खुशबू आती है, बच्चे बिना बुलाए एक-दूसरे के घर घुस जाते हैं, और दरवाज़े आधे खुले ही रहते हैं। यहाँ घर अलग हैं, पर ज़िंदगी साथ चलती है। इसका राज़ सिर्फ पुरानी इमारत नहीं, बल्कि रोज़ का व्यवहार है। एक ही मोहल्ले में सब एक-दूसरे की आदत, आवाज़ और समय जानते हैं। इसलिए पोलों में आम सड़क जैसी भीड़ कम, और अपनापन ज़्यादा लगता है। सच्ची, जयपुर की यह बात कमाल है: शहर बड़ा होता गया, पर कुछ गलियाँ अब भी म्हारे-ख़ास मेहमान जैसी महसूस होती हैं.
