जयपुर की शाम और गजरा का जादू
जयपुर की शाम में गजरा बस सजावट नहीं, एक छोटा सा रूटीन है। चौपड़, बाजार और कॉलोनी के कॉर्नर पर फ्लावर सेलर मोगरा और रजनीगंधा की डोरियाँ ठंडा पानी छिड़क कर संभालते हैं। कोई ऑफिस से सीधा आता है, कोई टेंपल जाने से पहले, और कोई स्कूटर के मिरर पर बस एक फ्रेश गजरा लटका लेता है। घणी महक से पूरी राइड का मूड बदल जाता है, सच्ची। इसका चक्कर भी लास्ट-मिनट का होता है। शाम चढ़ते ही जो गजरा सुबह की तरह नरम नहीं रहता, उसका रेट नीचे-उठता है; फ्रेश बंडल ही चलता है। इसी लिए राजू भाई ने वह लास्ट बंडल जल्दी बेचा—क्योंकि एक कस्टमर ने बिलकुल निकलते वक्त “ये वाला दो” बोल दिया। जयपुर में गजरा का यही उसूल है: देर की तो महक कम, और जो टाइम पे मिल गया, वही असली चार्म।
