जयपुर की सुबह, कचौरी के नाम
सुबह जयपुर में कुछ लोग अलार्म से नहीं, कचौरी की खुशबू से उठते हैं। छोटे ठेले पर कचौरी तलती है, बगल में चाय उबलती है, और साइकिल-स्कूटर वाले बिना बोले पंक्ति में लग जाते हैं। पधारो वाली भावना यहीं है—जल्दी भी, सुकून भी। यह सिर्फ नाश्ता नहीं, रोज़ का रास्ता है। कार्यालय जाने वाले, स्कूल छोड़कर लौटने वाले, और गली के दो-तीन पड़ोसी—सब एक ही जगह मिल जाते हैं। घणी दूर की बात नहीं, बस एक प्लेट और एक गिलास चाय। और जो 12 मिनट की पंक्ति होती है, वही इस जगह की असली पहचान बन जाती है। जयपुर में सुबह का ताल कभी घड़ी से नहीं, इस छोटी-सी लाइन से तय होता है।
